जीवन अनमोल होता है, जीवन भगवान के द्वारा हमें दिया गया सबसे बेहतरीन तोहफा है, और भी न जाने कितने शब्द जीवन की महत्ता को दर्शाने के लिए कवियों की कलम से निकले. लेकिन जब कभी जीवन की सुंदरता के पीछे छुपे बदसूरत चेहरे को देखा तो लगा कि यह तो वही बात है कि बदसूरती छुपाने के लिए परमात्मा ने भी प्लास्टिक सर्जरी कर रखी है जिन्दगी की. कभी-कभी तो लगता है कि प्रकृति के नियम अच्छे हैं, हर रात के बाद सवेरा कर ही देता है, लेकिन कुछ लोगों की जिन्दगी में भगवान ने सिर्फ रात ही क्यों लिखी है?
मैं आज के इस पोस्ट में समाज के उस वर्ग पर प्रकाश डालना चाहता हूं जिसे आप और हम, हर कोई किसी न किसी रोड या मोड़ पर देखते हैं, देख कर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन बहुत कम होते हैं जो उनके बारे में गंभीरता से सोचते हैं. कुछ लोग इनकी मदद के बहाने समाज सुधारक की पदवी धारण करते हैं तो कुछ नेता इनके नाम पर वोट भी मांग डालते हैं.
मैं बात कर रहा हूं स्ट्रीट चाइल्ड और रोड पर रहने वाले लोगों की, जिन्हें न तो समाज ने मान्यता दी है न सरकार ने. रोज सवेरे दिल्ली की सड़कों पर सफर करते समय रोड के किनारे ऐसे परिवार मिल ही जाते हैं. जीने के लिए यह या तो भीख मांगते हैं या कोई छोटी-मोटी चीज बेचते हैं. हममें से कई लोग इन लोगों को देख कर सोचते होंगे कि यह इन लोगों का धंधा है यानी दिन भर कड़ी धूप में भीख मांगना. और आप शायद सही भी हों. सड़को पर भीख मांगना इन लोगों का पेशा है मगर यह इनकी मजबूरी भी है. यह बच्चे मजबूर होते हैं भीख मांगने के लिए. आज देश में ऐसे कई माफिया हैं जो नन्हें बच्चों से भीख मंगवाने का काम करवाते हैं. देश के दूर-दराज के राज्यों और छोटे-छोटे गांवों से इन बच्चों को अगवा कर इन्हें अपंग बना इस कृत्य को अंजाम दिया जाता है. सोच कर भी दिल दहल जाता है. यह मैं नहीं दिल्ली, मुबंई आदि महानगरों की राज्य पुलिस का कहना है.
कहां से आते है यह स्ट्रीट चाइल्ड
कभी अपनी मर्जी से तो कभी पारिवारिक कलह की वजह से तो कभी अगवा होकर यह बच्चे इस गंदे दलदल में पहुंच जाते हैं. आखों में सपने तो कई होते हैं लेकिन जब सच्चाई की जमीन पर पांव पडते हैं तो जान हलक में आ जाती है. यह बच्चे अक्सर छोटे-छोटे गांवों से भागे होते हैं या अपने परिवार से बिछुडे होते हैं. कुछ असामाजिक तत्व इनकी मासूमियत का गलत फायदा उठा इन्हें अपने लिए इस्तेमाल करते हैं.
बड़े क्यों करते है भिक्षावृत्ति
बड़ा सवाल है, हालांकि मैं भी इसका जवाब नहीं जानता मगर जिस आधार पर मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं उसके मुताबिक भीख मांगने के इस काम में वही वयस्क शामिल होते हैं जो अपनी जिंदगी से हार चुके होते हैं या जिन्हें मुफ्त में भीख मांगना सही लगता है. वहीं वयस्क महिलाओं की अलग कहानी है. आज का समाज जब अच्छे घर की महिलाओं को भी टेढी नजर से देखता है तो इन निम्न वर्गीय स्त्रियों को तो कुछ समझेगा ही नहीं और जहां दिन-प्रतिदिन देह-व्यापार की दुकानें बढ़ती जा रही हों वहां अगर यह महिलाएं अपनी इज्जत बचा भीख मांगना सही मानें तो गलत क्या है? इन महिलाओं ने अपने सम्मान को बचाते हुए भूखे मरना बेहतर समझा और अपनी इज्जत को बचा भीख मांगना सही माना.
सबसे ज्यादा विचलित करती है बच्चों की दुर्दशा
यह बात किसी से नहीं छुपी है कि देश में बच्चों का व्यापार हो रहा है. इन बच्चों को देह-व्यापार से लेकर भिक्षावृत्ति तक के धंधे में भेजा जा ......
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मैं आज के इस पोस्ट में समाज के उस वर्ग पर प्रकाश डालना चाहता हूं जिसे आप और हम, हर कोई किसी न किसी रोड या मोड़ पर देखते हैं, देख कर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन बहुत कम होते हैं जो उनके बारे में गंभीरता से सोचते हैं. कुछ लोग इनकी मदद के बहाने समाज सुधारक की पदवी धारण करते हैं तो कुछ नेता इनके नाम पर वोट भी मांग डालते हैं.
मैं बात कर रहा हूं स्ट्रीट चाइल्ड और रोड पर रहने वाले लोगों की, जिन्हें न तो समाज ने मान्यता दी है न सरकार ने. रोज सवेरे दिल्ली की सड़कों पर सफर करते समय रोड के किनारे ऐसे परिवार मिल ही जाते हैं. जीने के लिए यह या तो भीख मांगते हैं या कोई छोटी-मोटी चीज बेचते हैं. हममें से कई लोग इन लोगों को देख कर सोचते होंगे कि यह इन लोगों का धंधा है यानी दिन भर कड़ी धूप में भीख मांगना. और आप शायद सही भी हों. सड़को पर भीख मांगना इन लोगों का पेशा है मगर यह इनकी मजबूरी भी है. यह बच्चे मजबूर होते हैं भीख मांगने के लिए. आज देश में ऐसे कई माफिया हैं जो नन्हें बच्चों से भीख मंगवाने का काम करवाते हैं. देश के दूर-दराज के राज्यों और छोटे-छोटे गांवों से इन बच्चों को अगवा कर इन्हें अपंग बना इस कृत्य को अंजाम दिया जाता है. सोच कर भी दिल दहल जाता है. यह मैं नहीं दिल्ली, मुबंई आदि महानगरों की राज्य पुलिस का कहना है.
कभी अपनी मर्जी से तो कभी पारिवारिक कलह की वजह से तो कभी अगवा होकर यह बच्चे इस गंदे दलदल में पहुंच जाते हैं. आखों में सपने तो कई होते हैं लेकिन जब सच्चाई की जमीन पर पांव पडते हैं तो जान हलक में आ जाती है. यह बच्चे अक्सर छोटे-छोटे गांवों से भागे होते हैं या अपने परिवार से बिछुडे होते हैं. कुछ असामाजिक तत्व इनकी मासूमियत का गलत फायदा उठा इन्हें अपने लिए इस्तेमाल करते हैं.
बड़े क्यों करते है भिक्षावृत्ति
बड़ा सवाल है, हालांकि मैं भी इसका जवाब नहीं जानता मगर जिस आधार पर मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं उसके मुताबिक भीख मांगने के इस काम में वही वयस्क शामिल होते हैं जो अपनी जिंदगी से हार चुके होते हैं या जिन्हें मुफ्त में भीख मांगना सही लगता है. वहीं वयस्क महिलाओं की अलग कहानी है. आज का समाज जब अच्छे घर की महिलाओं को भी टेढी नजर से देखता है तो इन निम्न वर्गीय स्त्रियों को तो कुछ समझेगा ही नहीं और जहां दिन-प्रतिदिन देह-व्यापार की दुकानें बढ़ती जा रही हों वहां अगर यह महिलाएं अपनी इज्जत बचा भीख मांगना सही मानें तो गलत क्या है? इन महिलाओं ने अपने सम्मान को बचाते हुए भूखे मरना बेहतर समझा और अपनी इज्जत को बचा भीख मांगना सही माना.
सबसे ज्यादा विचलित करती है बच्चों की दुर्दशा
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