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क्यों राम में रमना मुश्किल कॄष्ण में आसान

बचपन से ही मेरे दिमाग में यह बात आती थी कि यह हर मां अपने बच्चे को कृष्णा, गोपाला ही क्यों बुलाती है। जबकि आदर्श तो राम हैं। मैं खुद भगवान राम को अपने हृदय में रखता हूं। पर हर जगह मैंने यही देखा कि राम की तुलना में कृष्ण की स्वीकार्यता जनता में अधिक है। राम केवल मुसीबत में लोगों को याद आते हैं जबकि कृष्ण हर घड़ी। आखिर क्या वजह है कि मेरे आराध्य राम की मान्यता माखनचोर कृष्ण के आगे फीकी पड़ जाती है। 



बाद में पता चला कि राम और कृष्ण में अंतर हो ही नहीं सकता, दोनों जगतपालक श्री हरि विष्णु के ही अवतार हैं। दुविधाओं का अंत होता इससे पहले किसी बुजुर्ग ने दिमाग में बात डाल दी कि दोनों में अंतर मानना भी पाप है। पाप शब्द धर्म को मानने वाले के लिए काफी बड़ा होता है। सो इस विचार को कुछ सालों के लिए दिमाग से निकाल दिया। 



पर जब खुद की समझ हुई तब इस खोज में कुछ समय निकाल की क्या वाकई चाहे राम कहों या श्याम एक ही बात है। काफी सोचने…. नहीं नहीं प्रैक्टिक्ल तौर से सोचने पर मैं एक निष्कर्ष पर पहुंचा कि आखिर क्यों कृष्ण सजग हैं और राम महान। यहां वह बात समझ आई कि हर चीज के दो रूप होते हैं एक वास्त्विक एक आदर्श। राम आदर्श है आइडियल सिचुएशन है किसी पुरुष के लिए लेकिन कृष्ण वास्तविक हैं। कृष्ण वह हैं जो हम हैं। 



Krishna

कृष्ण का अस्तित्व 

कृष्ण का जन्म अस्तित्व की अत्यंत दुर्लभ घटनाओं में से एक हैं। कृष्ण को परमात्मा का पूर्ण अवतार माना गया है। अन्य सभी अवतारों को आंशिक माना है। इस देश की जनभावना में रचे बसे राम को भी पूर्णावतार नहीं माना गया। क़ृष्ण ईश्वर की हर लीलाओं के साथ मनुष्य के सभी अहम कर्तव्यों व चरणों को जीते हैं। कृष्ण को अपनाना आसान है इसलिए श्री हरि गोपाल के भक्त उनमें रमते हैं। राम सहज नहीं हैं, राम में रमना मुश्किल है, राम का जीवन अपनाना बेहद कठिन है इसलिए सब राम नहीं हो सकते। पर कृष्ण के बताए पथ पर चल कर हम कुछ दूर जरुर चल सकते हैं।


राम आर्दश कृष्ण प्रैक्टीकल

राम धर्म की राह पर चलते हुए अपनी पत्नी से अग्नि परीक्षा लेते हैं, पिता का मोह त्याग वनवास जाते हैं, अपने बच्चों से अलग रहते हैं। लेकिन कृष्ण धर्म में मध्यम मार्ग दिखाते हैं। क्या कहते है उसे सरल भाषा में …. हां बीच का रास्ता। कृष्ण अर्जुन की शादी कराने के लिए एक लड़की को भगाने में साथ देते हैं तो यह जानते हुए कि उनकी मंजिल की राह में राधा बाधा बन सकती हैं तो उसे छोड़ भी देते हैं।



ब्रेकअप के बाद आशिकों की भांति  खुद तड़पतेभी है और जब कुछ ऐसी ही दुविधा में अर्जुन होता है तो उसे गीता का ज्ञान भी देते हैं। सुदामा का दिल से स्वागत भी करते हैं और जब अर्जुन युद्ध में ढ़ीला पड़ता है तो उसे डांटते भी हैं। 


मध्यम मार्ग 

कृष्ण ने हर जगह मनुष्य़ को मध्यम मार्ग के रास्ते जीने का तरीका बताया है और यही वजह है लोग उन्हें इतना मानते हैं। कृष्ण जानते हैं कि मनुष्य को अगर सीमाओं और मर्यादाओं के जाल में जकड़ा जाए तो वह तो जी ही नहीं पाएगा। इसलिए वह खुद अपना आदर्श दिखाते हैं। खुद वह मस्तियां करते हैं शैतानियां करते हैं ताकि आने वाले युगों में जब बच्चे शैतानी करें तो माएं उन्हें डांटे ना। 



वह बालकाल में मटकियां भी तोड़ते हैं ताकि आने वाले युगों में जब बच्चे घरों के कांच तोड़ें तो अंकल जी को देने के लिए एक आदर्श उदाहरण हो, कृष्ण का उदाहरण। वह प्रकृति के समीप रहते हैं, ग्वाला जो ठहरे। वह यह संदेश देते हैं कि हे मनुष्य आने वाले युगों में इस गौ माता, यमुना नदी या पहाड़ो में अपनी श्रद्धा रखना। 

Krishna the Warrtior

बदनाम कान्हा 

हां एक और चीज है जिसकी वजह से कृष्ण को कुछ बदनाम भी मानते हैं.. प्रेम। अब भला इसमें कृष्ण का दोष नहीं है। उसे समझने वालों का दोष है। लोग आज खुद की जोड़ी को राधा कृष्ण की जोड़ी मानते हैं। अच्छी बात है लेकिन जब ब्रेकअप होता है तो इतना मरते क्यों है? क्या कृष्ण ने राधा से अलग होने पर या राधा ने कान्हा से अलग होने पर फांसी लगाई थी नहीं ना। फिर क्यों आज इश्क में पड़ कर लोग अपना करियर व पढ़ाई डुबो देते हैं। 


प्यार को समझो तो सही 

अरे भई कान्हा ने तो गुरुकुल में जाने के लिए अपना जन्मस्थान तक छोड दिया था। राह में आई राधा को भी समझा कर किनारा कर लिया कि हे प्रिये मेरे तेरा साथ यही तक था। जब वापस भी आए तो राधा के पीछे नहीं पड़े जहां नियति ने विवाह तय किया वहीं बंध गए। वो अरैंज मैरिज कहते हैं उसी टाइप का। 



क्या कृष्ण में वह सामर्थ्य नहीं था कि वह राधा को अपनी रानी बना पाते। नहीं अगर वह ऐसा कर देते तो शायद यह मध्यम मार्ग का सपना पूरा ना होता। यह जो प्यार में नाकामी पर जो लोग एसिड फेंक देते हैं यह सोच कर कि वह मेरी ना हो सकी तो किसी की ना होगी। भाई अगर अपनी जोड़ी को राधा कृष्ण की जोड़ी मानते हो तो थोड़ा यह भी सीख लेते कि इश्क को बदनाम नहीं किया जाता। 



राम आदर्श हैं सीता से अग्निपरीक्षा लेते हैं पर कृष्ण प्रैक्टिकल हैं। गुरुकुल से आने पर पहले कंस को साफ करते हैं फिर विवाह करते हैं रुकमणी से। नाम बेशक सभी राधा कृष्ण के प्रेम का लें पर कृष्ण सीख देते हैं कि निश्छल प्रेम ही प्रेम की सबसे बड़ी निशानी है। हम प्रेम को कितना जीएं यह सवाल नहीं है हम उस प्रेम के पल में कितना जिएं यह आवश्यक है। 



और जो कृष्ण को केवल प्रेम का संदेश वाहक समझते हैं वह यह नहीं जानते कि कृष्ण का सबसे बड़ा संदेश गीता में है। दोष  है उन ग्रंथो का जो यह लिखते हैं कि कान्हा रास रचिया है, करोडों गोपियों के साथ निधिवन में रास रचाते हैं। एक घटिया किस्म का डायलॉग भी है कृष्ण करें तो रासलीला हम करें तो कैरेक्टर ढ़ीला। अरे भाई वह कृष्ण थे तुम इंसान हो। उन्होंने अगर रास रचाया है तो गीता का ज्ञान भी तो दिया है। 


गीता लाइफ मैनेजमेंट का सागर



गीता दुनिया में लाइफ मैनेज़मेंट का सबसे बड़ा ज्ञान है। गीता का हर एक शब्द हमें यह सीखाता है कि कैसे जीवन में आगे बढ़ना है। ये जो लोग हैं जो इश्क में पड़ कर काम धाम छोड़ देते हैं उनके लिए भी मुरलीधर ने लिखा कि काम ना करना सबसे बड़ा गुनाह है। कर्म ही मनुष्य की नियती है। इससे कैसे पीछा छुड़ाओगे। कर्म करते जाओ फल कि चिंता मत करो। क्या लेकर आए थे क्या लेकर जाओगे। जो था यही से मिला यही देकर जाना है। 


बैराग्य नहीं गृहस्थ बनो 



एक और बात कृष्ण शिव की तरह बैराग्य का रास्ता भी नहीं सुझाते। कृष्ण यह नहीं कहते कि सब काम धाम छोड़ कर चले जाओ हिमालय की गर्त गुफाओं में। कृष्ण खुद विवाहित थे गृहस्थ जीवन बिताते थे। घर की किचन से लेकर पत्नी की समस्याओं को सुनते थे। 


कृष्ण हमारे तुम्हारे तरह ही तो हैं 



कृष्ण गलतियां भी करते थे, प्रण लेने के बाद भी युद्ध में चक्र निकाल लेते थे। धर्म का पाठ पढ़ाते थे पर निहत्थे दानवीर कर्ण पर प्रहार करने के लिए भी उकसाते थे। कृष्ण खुद तो अपनी प्रेमिका को छोड़ आए थे लेकिन अर्जुन के लिए अपनी ही बहन को भगाने में मदद करते थे, शायद खुद का प्यार अधूरा रहने की कशक रही होगी। 



कृष्ण सरोवर में नहाती गोपियों के वस्त्र भी चुराते थे और भरी सभा में द्रौपदी की लाज भी बचाते थे। कृष्ण समय व स्थिति को भांपते हुए मर्यादाओं को लांघने से भी बाज नहीं आते थे। धर्मराज से झूठ भी बुलवाते थे। 


आदि भी अननत भी 

राम ने पूरी रामायण में एक भी जगह नहीं कहा कि वह भगवान के रूप या अवतार हैं, ईशा मसीह कहते हैं कि वह ईश्वर की संतान हैं, पैगंबर भी कहते हैं कि वह केवल अल्लाह के बंदे हैं। लेकिन कृष्ण तो कृष्ण हैं। कृष्ण कुरुक्षेत्र में खड़े होकर विराट रूप धरके सीना ठोककर कहते हैं कि हां मैं ही परमात्मा हूं। मैं ही आदि ही मैं ही अन्नत हूं। तुम मुझ से ही आए हो तुम मुझ में ही समाओगे। 



इसे कृष्ण का अंहकार मत समझो। वह एक बंदा था जो कुरुक्षेत्र में युद्ध के बीच खड़ा होकर ड्रामे कर रहा था कि मैं तो ना लड़ रहा। उसी को हड़का रहे थे। वह पार्थ भी ढ़ीठ था इसलिए डराने के लिए विकराल रूप ले लिया था। बाकि सब सच है, सौ टका। 



कृष्ण में बहुत ऐब थे वह राम की तरह मर्यादापुरूषोत्तम जो नहीं थे। लेकिन हे पार्थ कृष्ण पूर्णावतार थे। वह मनुष्य को दिखाते थे कि क्या करने से क्या होगा? उनका जीवन मरण हर चीज आज के युग में प्रासंगिक है। यादव कुल का अंत पता है कैसे हुआ था? 



कहते हैं यादवों को एक नशे की आदत हो गई थी जिसके नशे में सारे यादव खत्म हो गए। जीवन के अंतिम क्षणों मे भी कृष्ण यह संदेश देकर जाते हैं कि हे मनुष्य देख अगर तू भी इस नशे का शिकार बना तो तेरा भी नाश निश्चित है। जब मेरा  श्री कृष्ण का विष्णु के अवतार के वंश का अंत हो सकता है तो सोच यह नशा तेरी क्या दशा करेगा। 



कृष्ण का अंत भी एक सीख देता है कि किसी से कुछ छुपाओं मत। एक पत्ता ही तो था जो उन्होंने अपने पांव के नीचे छुपा लिया था। देनी पड़ी जान, दे भी दी। क्या कृष्ण चाहते तो माया से अपने वंश का विनाश ना बचा लेते। लेकिन नहीं फिर कृष्ण को जग में मानता कौन? 



कृष्ण को समझना शायद बहुत मुश्किल है ओह सॉरी शायद आसान है। अपना ही तो जीवन में। जब कुछ गलत लगे तो कुछ देर रुको सोचे कि इससे आगे क्या होगा? सोचो कि इस स्थिति में कृष्ण क्या करते? कौन सा बीच का रास्ता अपनाते। मिल जाएगा रास्ता। अंत में यह जरूर कहूंगा कि चाहे राम कहो या कृष्ण दोनों में खुद को ढूंढ़। 

क़ृप्या इस पोस्ट से अगर किसी की भावनाएं आहत हो तो वह मध्य मार्ग अपनाते हुए ब्लॉग को ना पढ़े। जय श्री राम। ऊं श्री कॄष्णाय शरणं ममः ॥

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