बचपन से ही मेरे दिमाग में यह बात आती थी कि यह हर मां अपने बच्चे को कृष्णा, गोपाला ही क्यों बुलाती है। जबकि आदर्श तो राम हैं। मैं खुद भगवान राम को अपने हृदय में रखता हूं। पर हर जगह मैंने यही देखा कि राम की तुलना में कृष्ण की स्वीकार्यता जनता में अधिक है। राम केवल मुसीबत में लोगों को याद आते हैं जबकि कृष्ण हर घड़ी। आखिर क्या वजह है कि मेरे आराध्य राम की मान्यता माखनचोर कृष्ण के आगे फीकी पड़ जाती है। बाद में पता चला कि राम और कृष्ण में अंतर हो ही नहीं सकता, दोनों जगतपालक श्री हरि विष्णु के ही अवतार हैं। दुविधाओं का अंत होता इससे पहले किसी बुजुर्ग ने दिमाग में बात डाल दी कि दोनों में अंतर मानना भी पाप है। पाप शब्द धर्म को मानने वाले के लिए काफी बड़ा होता है। सो इस विचार को कुछ सालों के लिए दिमाग से निकाल दिया। पर जब खुद की समझ हुई तब इस खोज में कुछ समय निकाल की क्या वाकई चाहे राम कहों या श्याम एक ही बात है। काफी सोचने…. नहीं नहीं प्रैक्टिक्ल तौर से सोचने पर मैं एक निष्कर्ष पर पहुंचा कि आखिर क्यों कृष्ण सजग हैं और राम महान। यहां वह बात समझ आई कि हर चीज के दो रूप होते हैं...